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ABOUT UNIQUE SCHOOL OF EDUCATION

REGISTERED BY GOVT. OF RAJASTHAN UNDER RAJASTHAN SOCIETY REGISTRATION ACT. 1958

जैसा कि आप जानते हैं बच्चों का मुख्य विकास 3 वर्ष से प्रारम्भ होता है इस आयु में बच्चों के सोचने, समझने की क्षमता विकसित हो जाती है यदि उसे 3 से 5 वर्ष की आयु में उचित शिक्षा प्राप्त हो तो बच्चे की भावी शिक्षा सहज हो जाती है और बच्चे का शारीरिक विकास भी सही हो पाता है।

जैसे किसी बीज को पेड बनाने के लिए उसको सबसे पहले जमीन में उचित रूप में दबाया जाता है उसके बाद अंकुरित होने पर उसकी देखभाल बहुत अच्छे तरीके से करनी होती है क्योंकि इसी देखभाल से वह आगे जाकर बड़ा वृक्ष बनेगा इसी तरह बच्चों का 3 वर्ष की आयु से यदि उचित शिक्षा मिलेगी तो वह निश्चित ही भावी जीवन में अच्छा नागरिक बनेगा । बच्चे के चारित्रिक गुणों को मालूम करना होता है और उनका विकास भी करना होता है जो केवल नर्सरी (पूर्व प्राथमिक) शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।

राष्ट्रीय शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान (एन.सी.ई.आर.टी.) ने पूर्व बाल्यावस्था की शिक्षा की स्थिति को गम्भीरता पूर्वक समझा तथा पूर्व बाल्यावस्था की शिखा पर अनुसन्धान करने के लिए एक पृथक विभाग की स्थापना की ।

 इस विभाग ने पूर्व बाल्यावस्था की शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं के लिए मार्गदर्शन देना प्रारम्भ किया तथा प्रशिक्षण साहित्य के निर्माण कि दिशा में प्रयास किये गये। नर्सरी विद्यालयों के लिए मानक निर्धारित किये गये । (एन.सी.ई.आर.टी.) के कुछ विद्वानों ने इन्डियन एसोसियेशन आॅफ प्रीपाइमरी एजूकेशन(आई.ए.पी.ई) की स्थापना की । प्रदेशों में इसका पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया ।

पूर्व बाल्यावस्था की शिक्षा (ई.सी.ई) को बाल विकास के लिए आवश्यक माना जाने लगा है। ई.सी.ई. की उपयोगिता इस सन्दर्भ में भी मानी जाती है कि इससे बालक प्राथमिक स्तर की शिक्षा के लिए शारीरिक तथा मानसिक रूप से तैयार हो जाते है। वर्तमान समय में नर्सरी विद्यालयों का विकास अत्यन्त तेजी से हुआ है। पूर्व बाल्यावस्था की शिक्षा का विकास जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी तेज से नर्सरी विद्यालयों मंे पढ़ाने वाले शिक्षकों/शिक्षकाओं के प्रशिक्षण की दिशा में कम प्रगति हुई है।

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